info@regmihari.com.np

Bahattar Vakya Shree Ramanujacharya

ramanuja swami

श्रीमते रामानुजाय नम:।

भगवान भाष्यकार श्रीरामानुजाचार्य के अंतिम उपदेश बहत्तर वाक्य


दयासागर श्रीभाष्यकार भगवान श्रीरङ्ग मन्दिर में कालक्षेप के समय परमैकान्तिकशिष्यों से बोले, हे श्रीवैष्णवों !


1) अपने आचार्य एवं अन्य श्रीवैष्णव भागवत दोनो का कैंकर्य समान भाव से करना चाहिए।

2) पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में विश्वास करके ही आचरण करना चाहिए।

3) रातदिन इन्द्रियों का दास बन कर नहीं रहना चाहिए।

4) सामान्य शास्त्रों में निष्ठा नहीं रखनी चाहिए अर्थात् तामसादि शास्त्रों में कहे हुए लौकिक फलों को देने वाले कर्मों के करने की इच्छा नहीं करनी चाहिये।

5) भगवद् विषयकशास्त्रों में ही सदारूचिरखनी चाहिये।

6) आचार्य चरणों की कृपा से यदि ज्ञान सागर हृदय में लहरा उठे तो फिर भूलकर भी शब्दादिविषयों का दास नहीं बनना चाहिये।

7) शब्दादि सभी विषयों को सामान्य दृष्टि से ही देखना चाहिये। (अर्थात इन्द्रियों के सभी विषयों को आत्मा के पतन के कारण होने के लिए समान समझें।

8) पुष्प,चन्दन, पान, सुगन्धित पदार्थों में कभी भी वासनात्मक रूचि नहीं रखनी चाहिये, भगवत प्रसाद रूप बुद्धि रखें एवं भगवद अनर्पित दव्यों को त्याग देवें।

9) भगवन्नाम संकीर्तन के समान प्रीति महाभागवतों के नाम संकीर्तन में भी करनी चाहिए।

10) यह सोच कर कि महाभागवतों के आश्रयण से ही भगवान की प्राप्ति होती है, महाभागवतों के आदेश का पूर्णत: पालन करना चाहियें।

11) रागादि से प्ररित हो कर यदि अज्ञ मनुष्य (कितना भी ज्ञानी क्यों न हो) भगवान का और भागवतों का कैंकर्य छोड़ेगे तो वे विषयों में आसक्त हो कर नष्ट हो जायेंगे- श्रीमन्नारायण के शेषत्व और पारतंत्रय आत्मस्वरूप से च्युत हो जायेंगे।

12) श्री वैष्णव स्वरूपानुष्ठान (कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि) को भगवद प्राप्ति का उपाय न मान कर उपेय रूप समझना। (भगवान ही उपाय, भगवान ही उपेय)


13) महाभागवतों को एकवचन से न बुलाना चाहिये, उन्हे आदर पूर्वक सम्बोधित करना चाहिए।

14) श्रीवैष्णवों को देखते ही पहले स्वयं हाथ जोड़ कर प्रणाम करें। (उनके अभिवादन की प्रतीक्षा न करें)


15) भगवान की एवं श्रीवैष्णवों की सन्निधि में पैर फैला कर न बैठे (दास भाव से बैठना चाहिए।

16) भगवान, गुरूदेव और श्रीवैष्णवों के स्थान की तरफ पैर फैला कर न सोवेें।

17) सोने से पहले और प्रात:काल जागकर गुरूपरम्परा का अनुसंधान करें।

18) भगवत्सन्निधि में बैठे हुए भागवतों को देखें तब ‘समस्त परिवार विशिष्टाय श्रीमतेनारायणायनम:’करकर साष्टांग करें।

19) भगवत् भागवतों का गुणानुवाद करते हुए श्रीवैष्णवों की यथाशक्ति पूजा किये बिना और प्रणाम किये बिना बीच में चले जाना महान अपचार है।

20) श्रीवैष्णवों का आगमन सुन कर सन्मुख आगे बढ़ कर स्वागत करना और जाते समय कुछ दूर साथ चल कर बहुमान पूर्वक विदा करना चाहिये,ऐसा न करने पर महान अपराध होता है।

21) आत्मा के उज्जीवन के लिये अपने को श्रीवैष्णवों का शेष भूत मान कर श्रद्धापूर्वक श्रीवैष्णव महात्माओं की आज्ञा का अनुसरण करते हुए शरीर पोषण कीजिये। सांसारिक लोगों के घर-घर सदा भटकना(कुछ धन प्राप्ति
आदि की इछा से उनकी झूठी प्रशंसा करना) और अपने नियमों को छोड़ना यही अनाचार है और श्रीवैष्णव स्वरूप के लिये हानिकारक है।

22) भगवान के दिव्य मन्दिरो, गोपुरों एवं विमानों का देखते ही हाथ जोड़ें।

23) अन्य देवताओं के विमान को देख कर आश्चर्य न करें। दैवतान्तर की महिमा सुनकर विस्मय न करें।

24) भगवत् भागवत महिमा वर्णन करते हुए पुण्य पुरूषों को देख कर आनन्दित न होना तथाव्यर्थ ही उनपर आक्षेप करना निश्चय ही अपचार है।

25) किसी श्रीवैष्णव की छाया का उल्लंघन न करें।

26) अपने देहकी छाया भी श्रीवैष्णवों पर न पड़ने दें।

127) इतर लोगों का स्पर्श करने के बाद उस अपवित्रता को दूर करने के लिए श्रीवैष्णावों काचरण स्पर्श करें ।

28) दरिद्र श्रीवैष्णव के अभिवादन का प्रत्युतर न देना भागवत अपचार है।

29) ‘मैं दास हूँ’ ऐसा कह कर प्रणाम करने वाले श्रीवैष्णव का आदर करना चाहिये। अनादर करना महान् अपचार हैं।

30) श्रीवैष्णवों के जन्म, कुल और आलस्यादि का निरूपण नहीं करना चाहिये। श्रीवैष्णवों के दोषों को न देखें, न कहें, दोषों को भूल कर उनके गुणों की ही चर्चा करनी चाहिये।

31) सामान्य जनो के सन्मुख भगवान का तीर्थ और भागवतों का श्रीपादतीर्थ नहीं लेना चाहिये।

32) तत्व त्रय एवं रहस्य त्रय को नहीं जानने वालों का तीर्थ नही लेना चाहिए।

33) ज्ञानी एवं सदाचारी श्री वैष्णव का श्रीपाद तीर्थ प्रयत्न पूर्वक नित्य लेना चाहिए।

34) भागवतों एवं मुझ (यतिराज) में समबुद्धि नहीं रखनी चाहिये।माने परमैकान्तिक भागवतों को मुझसें (यतिराज से) भी श्रेष्ठ समझें।

35) यदि भूल से भी प्राकृत लोगों का स्पर्श हो जाये तो वस्त्रों सहित स्नान करके श्रीवैष्णवों का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना चाहिये।

36) वैराग्य, ज्ञान, भक्ति आदि सम्पन महात्माओं को नित्यसूरि के समान मान कर उनमें विश्वास करना चाहिये।

37) वैराग्य, ज्ञान, भक्ति आदि सम्पन्न श्रीवैष्णव महात्माओं में प्रेम बढ़ाना चाहिये।

38) प्राकृत लोगों के घर पर भगवान का तीर्थ नहीं लेना चाहिये और उन लोगो के घरों में स्थित भगवान के विग्रह की सेवा नहीं करनी चाहिए।

39) भगवान के दिव्य देशो में साधारण जन के देखने पर भी तीर्थ प्रसाद ग्रहण करो क्योंकि दिव्यदेशों में दृष्टिदोष नहीं माना जाता है।

40) “दास ने आज एकादशी व्रत किया है” ऐसा कह कर भगवान की सन्निधि में भागवतों के द्वारा दिये गये गोष्ठी प्रसाद का त्याग नहीं करना चाहिये।

41) समस्त पापों को नष्ट करने वाले भगवत् प्रसाद में कभी भी उच्छिष्ट भावना नही रखनी चाहिये।

42) कभी भी श्रीवैष्णव के सामने अपनी प्रशंसा न करें। नित्यनैच्यानुसंधान रत रहें।

43) श्रीवैष्णवों की सन्निधि में किसी का तिरस्कार न करें।

44) श्रीवैष्णव महात्माओं के गुणों का अनुभव तथा उनकी सेवा क्षण भर भी किये बिना कोई कार्य न करे।

45) दिन में एक घड़ी भी अपने आचार्य के गुणों का अनुसन्धान करना चाहिये।

46) दिन भर में एक घड़ी भी श्रद्धा, विश्वासपूर्वक श्रीशठकोप आदि दिव्यसूरियों के प्रबन्धों का अनुसन्धान करना चाहिये।

47) देहाभिमानी जनों का संग न करें।

48)शंख चक्रांकित होने पर भी विषयातुर एवं लंपट व्यक्तियों का संग कदापि न करें।

49) पर छिन्दान्वेषी (पराये दोषों को कहने में तत्पर) जनों से वार्तालाप न करें।

50) संयोगवश देवान्तरों के भक्तों का संग हो जाये तो, उस दोष की निवृति के लिये महाभाग्यशाली श्रीवैष्णवों का संग करें।

51) भगवान के भक्तों के निन्दक जनों को कभी न देखें।आचार्य द्वेषी लोगों को भी कभी नहीं देखना चाहिये।

52) द्वय मंत्र में निष्ठा वाले पुरूषों का सहवास करें।

53)उपायान्तर (भगवत्प्राप्ति में भगवान को उपाय न मानने वाले) में जिनकी निष्ठा हो ऐसे व्यक्तियों का संग त्यागना चाहिये।

54) प्रपत्ति(शरणागति) में जिनकी निष्ठा हो उनका सहवास करना चाहिये।

55) रहस्यत्रय एवं तत्वत्रय के मर्मज्ञ महाभागवतों का सदा संग करें।

56) अर्थ और काम में तत्पर रहने वालों के साथ कभी भी न रहना चाहिए।

57) भगवद्भक्ति में निष्ठा रखने वाले महानुभावों से ही बातचीत करें।

58) यदि किसी श्रीवैष्णव के द्वारा अपना तिरस्कार भी हो जाये तो बुरा न मानकर मौन रहना चाहिये और उसे याद न रखना चाहिये।

59) श्रीवैष्णव श्री वैकुण्ठ जाना चाहे तो उसे सदा समस्त श्रीवैष्णवों की निरन्तर भलाई करने में ही निरन्तर लगे रहना चाहिये।

60) अपने धर्म के विरूद्ध किसी भी कर्म को चाहे वह प्रत्यक्षत: कितना भी बड़ा फलप्रद क्यों न हो, उसे बुद्धिमान श्रीवैष्णव कभी नहीं करे क्योंकि वे अहितकर होते हैं।

61) भगवान को समर्पित किये बिना अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।

62) पुष्प, चन्दन, पान, वस्त्र, जल, फल आदि भी भगवान को समर्पित किये बिना ग्रहण न करें।

63) उपायान्तर से बिना मांगे भी मिलने वाली कोई भी वस्तु स्वीकार न करें।

64) जाति दुष्ट अन्न माने प्याज, लहसुन आदि, आश्रय दुष्ट अन्न माने निकृष्ट जातियों का अन्न तथा निमित दुष्ट अन्न माने जूठा या कुत्ते, बिल्ली, कौए वगैरह का छुआ हुआ आदि ।

दोषों से रहित शुद्ध अन्न को ही भगवान को भोग लगाकर आदरपूर्वक ग्रहण करें। (फूलगोभी, मसूर की दाल,गाजर,चॉकलेट (coco) आदि वस्तुओं को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए)


65)अपनी रूचि के लिये अपने को प्रिय (परन्तु निषिद्ध या अशुद्ध) पदार्थ परमात्मा को भोग न लगावें। यह स्वदेह भोग है,भगवद् भोग नहीं शास्त्रानुसार सभी पदार्थों का नियमित समय पर भगवान को भोग लगावें।

66) भगवान के समर्पित अन्न, जल, फल, सुगन्धित पदार्थ आदि में सदा प्रसाद बुद्धि रखनी चाहिये, भोग बुद्धि कभी भी न रखें।

67) शास्त्रोक्त समस्त नित्य,नैमितिक कर्मों को कैंकर्य बुद्धिसे ही करें।

68) मन्तत्रत्रय (मूल, द्वय, चरम) इन तीनों मंत्रार्थ में पूर्ण निष्ठा रखने वाले महाभागवतों के अपराध के सिवा जीवात्माके अध:पतन का कारण नहीं है। अर्थात ऐसे महाभागवतों का अपचार करने से उभय लोकों के समस्त वैभव नष्ट हो जाते है।

69)भागवतों के मुखोल्लास के बिना अपने मोक्ष का कोई उपाय नहीं है।

70) भागवतों की पूजा से बढ़कर पुरूषार्थ नहीं और भागवत द्वेष से बढ़कर आत्मनाश नहीं।

71) अर्चावतार भगवान में शिला बुद्धि रखना,आचार्यदेव में मानव बुद्धि रखना,श्रीवैष्णवों में उनकी जाति की भावना रखना, कलिमल के महापाप नाश करने वाले भगवान के तीर्थ में और श्रीवैष्णवों के श्रीपादतीर्थ में सामान्य जल की भावना करना, कलि के दोषों को दूर करने वाले वेद प्रमाण सिद्ध मंत्र में सामान्य शब्दों की बुद्धि रखना और सर्वेश्वर भगवान को अन्य देवों के समान मानना, ये सब नरक से डालने वाले महापातक है और भगवत् भागवत, आचार्य के उपचार हैं।

72) भागवत पूजा भगवत पूजा से श्रेष्ठ है। भगवान के अपमान से भागवतों का तिरस्कार अधिक पापजनक है। भागवतों का श्रीपादतीर्थ भगवान के चरणोदक से उत्तम है अतः आलस्य रहित हो कर भागवतों की आराधना में तत्पर रहना चाहिये।

श्रीरामानुज स्वामीजी के अन्तिम छः उपदेश है ।

हे श्रीवैष्णवों! आप लोग जो नित्यकर्म, धर्मादि अनुष्ठान करते है उनको उपाय बुद्धि से न करें अर्थात हमारे किये कर्मों से प्रभु प्राप्त होगें ऐसी बुद्धि न रहे। नित्य कर्मों के करते समय यही बुद्धि होना चाहिए कि भगवत्प्राप्ति भगवत कैंकर्य में ही निश्चित है।

|1) श्रीभाष्य को प्रेमपूर्वक पढ़ कर, पढ़ाना तथा उसका लोक में प्रचार व प्रसार करना चाहिये। यदि इसमें असमर्थ हो तो,


2)श्री शठकोप सूरि आदि के दिव्य प्रबंधों का एवं देशिकोत्तम दस पूर्वाचार्यों के ग्रन्थो का पठन करना चाहिए एवं शिष्यों को सदा उनका उपदेश करना चाहिए।

3)हे वैष्णवों! यदि यह भी न हो सके तो पूर्वाचार्यों एवं दिव्यसुरियों के अभिमत दिव्यदेशों में निवास करते निरन्तर भगवत्कैंकर्य करें।

4)हे वैष्णवों! यदि इसमें भी बुद्धि ठीक न लगे तो अहंकार आदि त्याग कर आजीवन मेलकोटा में हमारे मठ में कुटी बनाकर नित्यनिवास करें।

|
5) हेवत्स! यदि यह भी न रूचे तो आजन्म पर्यन्त आलस्य रहित, सावधान हो कर, निरन्तर अर्थ अनुसंधान पूर्वक द्वयमन्त्र का उच्चारण करते हुए निवास करें।

6)यदि इसमें भी बुद्धि न लगे तो सावधान होकर एक और अंतिम हितोपदेश कहते है, सो सुनिये। परम एकांतिक सात्विक श्रीवैष्णव की दिन-रात सेवा में लग कर उनके अभिमानपात्र बनें रहें। यही चरमोपाय है इससे परे उत्तम उपाय कुछ भी नहीं है।

द्वयमंत्र
श्रीमन्नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये श्रीमते नारायणाय नमः।

Download Vahattar vakya Free PDF File

1 thought on “Bahattar Vakya Shree Ramanujacharya

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *